Wednesday, October 9, 2013

मतदाताओं के नाम

मतदाताओं के नाम
स्वप्न वैसा ही देखना चाहिए जो पूरा हो सके, जिसके अनुरूप पुरूषार्थ किया जा सके। कल्पना और आशा की अधिकता आदमी को भटका देती है। यथार्थ के ठोस धरातल पर कदम रखने वाला ही अपनी मंजिल तक पहुँच सकता है। इसके लिए भगवान बनने की धुन छोड़ कर मनुष्य बनने का लक्ष्य सामने रखना चाहिए।“
दुर्भाग्य से मतदाता को ईश्वर बनाने का, स्वप्न नेताओं द्वारा चुनावों से ठीक पहले दिखाया जाता है और सचमुच में ईश्वर बन गया हूँ ऐसा मतदाता समझ भी लेता है। मतदाता चुनाव तक कुप्पा होकर घूमता है। अपने आप को ईश्वर समझ अपने अतीत और भविष्य को भूल जाता है। मतदाताओं को सर्वोपरि बनाने का यह खेल चुनाव समाप्त होते ही सह-मात हो जाता है। चुनाव समाप्ति बाद मतदाता कोल्हू के बैल की तरह फिर से जिंदगी की जंग में पिसने लगता है। 

जब मतदाता चुनावों में सत्ता निर्धारक होता है तब मीडिया भी गजब की लाइनें लिखता है..
-मतदाता ने साधी चुप्पी, समीक्षक भी हैरान

-नेताओं का भाग्य मतदाता की मुठ्ठी में
-मतदाता बताएंगे,भ्रष्ठ नेताओं की औकात

-मतदाता तय करेंगे नेताओं का भाग्य
और इतना मीडिया द्वारा लिखने भर से मतदाता चढ जाता है ‘’चने के पेड़’’ पर और भूल जाता है अपने भूखे मरने की औकात। 
सितम तो तब होता है जब पार्टियां अपने घोषणा-पत्र वायदों की दुकान लगा दी और वोटर को मकान देने, टेबलेट, मुफ्त लोन आदि देने की घोषणा करती है। इतना भर सुनते मतदाता अपनी इच्छुक पार्टी का लाउडस्पीकर बन जाता है औऱ घसियारे की तरह नेताओं की बातों को गाता फिरता है।
लेकिन मतदाता भाइयो, खुद को पहचानों नेताओं के चुनाव में तुम गोता न लगाओ और सोच समझकर अपने मताधिकार को प्रयोग में लाओ...............................

आपका शुभचिन्तक 
सोमू आजाद 

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